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"भागती दुनिया में जहाँ वक़्त का ठिकाना ही नहीं,
गैर तो गैर सही अपनों को जाना ही नहीं,
मरती हुई हरेक लम्हा जिन्दगी के कतरों में;
चलो मासूमियत ढूंढते है, चलो इंसानियत ढूंढते है,
कदम के साथ कदम मिलाने की कोशिश में जहाँ,
रस्ते में पड़े मौकों को भुनाने में जहाँ,
कहीं दूर भँवर में जिसे छोड़ा था कभी;
"सदा खुश रहो" कहती उन भीगी पलकों में,
चलो इंसानियत ढूंढते है,
मशगुल दिखे "ख़ुशी", ख़ुशी पाने की हसरत में,
"जल्दी मुकाम" पाने का जुनून इन्सां की फितरत में,
"चाहे जैसे भी" की लत में, कोई "धुयें के व्यसन में,
पर आते ही नज़र चेहरा "बाप" का इन झुकी नज़रों में,
चलो इंसानियत ढूंढते हैं,
"मैं कौन हूँ?" और "कहाँ हूँ?" हर वक़्त ढूंढते हो,
"अजनबी" सवालों का पता "अजनबी" से पूछते हो,
जहाँ देने के लिए "समय" भी "समय" खो जाता है,
वहीँ दिखते ही "शव-यात्रा" बरबस रुके पैरों में,
चलो इंसानियत ढूंढते हैं, चलो इंसानियत ढूंढते हैं......
Manish Singh "गमेदिल"
"आज बाँहों में शक्ति को भरना है हमे,
गाँधी ही नहीं आजाद भी बनना है हमे,
शक्ति की आराधना करनी ही होगी,
अगर भारत को आज़ाद ही रखना है हमे।
कर चुके कितनी ही हम शांति वार्ता,
कोई बताये कितनी मिली हमे सफलता,
मीठी बाँतो से देश की रक्षा ना होगी,
हारते ही रहेंगे गर बांहों में शक्ति ना होगी,
अब कोई समझौता नहीं करना है हमे
अगर भारत को आज़ाद ही रखना है हमे।
हम चले विश्व को शांति सन्देश देने,
किन्तु वो आ गया हमारे ही प्राण लेने,
मिटा सिंदूर कोख उजड़ी कितनो की,
किसने सुनी है पीड़ा दुर्बल-जनों की,
आज रिपु मान मर्दन करना है हमे,
अगर भारत को आज़ाद ही रखना है हमे।
मत भूलो कुछ ही हैं मानवतावादी,
हर तरफ खड़ा है एक आतंकवादी,
प्रेम का राग जिसे आता ही नहीं,
शांति का सन्देश जिसे भाता ही नहीं,
एकजुट होकर आतंकवाद से लड़ना है हमे,
अगर भारत को आज़ाद ही रखना है हमे।
वक़्त आ गया है शक्ति उपासना का,
पीड़ित भारत भूमि की आराधना का,
ह्रदय में हो प्रेम, बाँहों में शक्ति हो,
इस सफलता मंत्र की घोर साधना का,
नवशाक्तियुग का आवाहन करना है हमे,
अगर भारत को आज़ाद ही रखना है हमे।
Manish Singh "गमेदिल"
मौत ही दुश्मन नहीं,
जिन्दगी भी कम नहीं,
फिजा ही लूटे जिसे;
महके वो गुलशन नहीं,
आँख भी वीरान है,
पास आँसूं चंद नहीं,
पिटारा है गम का वो,
जिस ख़ुशी में तुम नहीं,
किस्मत ही है जब खफा,
बेवफा फिर तुम नहीं,
रंज इतना है "गमेदिल"
राहों में तू संग नहीं...............
Manish "गमेदिल"
भारत के वीर सेनानी, तू अभी भी सो रहा है,
देख भारत रो रहा है, देख भारत रो रहा है;
अब भी चहुं-ओर अँधियारा है,
मानवता ने हमे पुकारा है,
कहाँ गए वो देश भक्त,
जो कहते देश हमारा है,
क्या भारत कोख में अपनी कायरों को ढो रहा है?
देख भारत रो रहा है;
जागो! देख हिमालय को,
जो जड़ों को अपनी खोल रहा है,
जो धोता रहा पैर हमारे;
आज हमी से बोल रहा है,
क्यों भारत के दामन मैं तू काँटों को बो रहा है,
देख भारत रो रहा है;
विश्व को जिसने संभाला,
आज वो पीछे क्यों है?
जिसने छुआ आसमां पहले,
आज वो नीचे क्यों है?
देश को रोशन जो करता वो सितारा खो रहा है,
देख भारत रो रहा है;
स्वार्थ का चोला हटाकर,
एक प्रण निश्चित करना है,
खुद को बदलकर आज हमें,
देश को विकसित करना है,
ए! मेरे भारत के वीरों देश पीछे हो रहा है;
देख भारत रो रहा है;
Manish "गमेदिल"
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मुझे ना रोको तूफां हूँ मैं,
कुछ ना पूछो कहाँ हूँ मैं,
जहां बेबसी में कोई रोता मिले;
समझ ले नादाँ वहां हूँ मैं,
मिटता नहीं वो निशाँ हूँ मैं,
गमेदिलों का आशियाँ हूँ मैं,
अरे "गमेदिल" मुझे गम कहते हैं;
दिल की जमीं का आसमां हूँ मैं.................
Manish "गमेदिल"