"चलो इंसानियत ढूंढते है"

on Monday, September 6, 2010

.
"भागती दुनिया में जहाँ वक़्त का ठिकाना ही नहीं,
गैर तो गैर सही अपनों को जाना ही नहीं,
मरती हुई हरेक लम्हा जिन्दगी के कतरों में;
चलो मासूमियत ढूंढते है, चलो इंसानियत ढूंढते है,

कदम के साथ कदम मिलाने की कोशिश में जहाँ,
रस्ते में पड़े मौकों को भुनाने में जहाँ,
कहीं दूर भँवर में जिसे छोड़ा था कभी;
"सदा खुश रहो" कहती उन भीगी पलकों में,
चलो इंसानियत ढूंढते है,

मशगुल दिखे "ख़ुशी", ख़ुशी पाने की हसरत में,
"जल्दी मुकाम" पाने का जुनून इन्सां की फितरत में,
"चाहे जैसे भी" की लत में, कोई "धुयें के व्यसन में,
पर आते ही नज़र चेहरा "बाप" का इन झुकी नज़रों में,
चलो इंसानियत ढूंढते हैं,

"मैं कौन हूँ?" और "कहाँ हूँ?" हर वक़्त ढूंढते हो,
"अजनबी" सवालों का पता "अजनबी" से पूछते हो,
जहाँ देने के लिए "समय" भी "समय" खो जाता है,
वहीँ दिखते ही "शव-यात्रा" बरबस रुके पैरों में,
चलो इंसानियत ढूंढते हैं, चलो इंसानियत ढूंढते हैं......

Manish Singh "गमेदिल"

2 comments:

'अदा' said...

भागती दुनिया में जहाँ वक़्त का ठिकाना ही नहीं,
गैर तो गैर सही अपनों को जाना ही नहीं,
मरती हुई हरेक लम्हा जिन्दगी के कतरों में;
चलो मासूमियत ढूंढते है, चलो इंसानियत ढूंढते है

जीवन की सच्चाई को आँक गयी हैं आपकी पंक्तियाँ...
मासूमियत और इंसानियत तो जैसे जीवन से ही गायब हो गए हैं...
धन्यवाद...

Manish Singh "गमेदिल" said...

आपकी नज़र हमारे ब्लॉग तक पहुंची और उस पर आपकी टिप्पणी ,,,,,,,, अहो भाग्य हमारे…… आपके विचार हम तक पहुँचते रहेंगे, हमारी कलम को नया उत्साह मिलता रहेगा…… ये रिश्ता यूँ ही बनाये रखियेगा……. क्यूँ की ज़ब तक रचना पर कोई टिप्पणी नहीं करता तब तक उस रचनाकार को चैन नहीं आता …….. आप समझ ही गए होंगे ………..

Post a Comment

Data Entry Work @ Home